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अयोध्या में योगी बनाम अखिलेश की जंग हुई तो कौन मारेगा बाजी? चुनावी आंकड़ों में BJP आगे, सपा ने भी बढ़ाई ताकत

Yogi Adityanath vs Akhilesh Yadav
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उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अयोध्या की राजनीति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के बीच अयोध्या से चुनाव लड़ने को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है। अखिलेश यादव ने योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती दी थी। इसके जवाब में मुख्यमंत्री ने भी उन्हें आमने-सामने मुकाबला करने का न्योता दिया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर दोनों नेता अयोध्या विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते हैं, तो किसकी स्थिति मजबूत हो सकती है? पिछले तीन विधानसभा चुनावों के आंकड़े इस मुकाबले की दिलचस्प तस्वीर पेश करते हैं।

2012 में सपा, जबकि 2017 और 2022 में भाजपा ने मारी बाजी

अयोध्या विधानसभा सीट के पिछले चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी के पवन पांडेय ने जीत दर्ज की थी। उस चुनाव में सपा को 55,262 वोट मिले थे, जबकि भाजपा के लल्लू सिंह को 49,857 वोट प्राप्त हुए थे। इससे स्पष्ट हुआ कि अयोध्या में सपा भी मजबूत राजनीतिक आधार रखती है।

वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने वापसी की। पार्टी के उम्मीदवार वेद प्रकाश गुप्ता को 1,07,014 वोट मिले, जबकि सपा के पवन पांडेय को 56,574 वोट प्राप्त हुए। भाजपा का मत प्रतिशत लगभग 49.20 प्रतिशत रहा।

वर्ष 2022 के चुनाव में भी भाजपा ने अपनी सीट बरकरार रखी। वेद प्रकाश गुप्ता को 1,13,414 वोट मिले, जबकि पवन पांडेय को 93,424 वोट प्राप्त हुए। भाजपा का मत प्रतिशत 49.04 प्रतिशत और सपा का 40.40 प्रतिशत रहा। इन नतीजों से पता चलता है कि भाजपा आगे रही, लेकिन सपा ने भी अपना समर्थन बढ़ाया।

2024 के लोकसभा चुनाव ने बदला राजनीतिक माहौल

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट पर समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद ने भाजपा के लल्लू सिंह को हराया था। इस परिणाम के बाद अयोध्या क्षेत्र में भाजपा की चुनावी रणनीति और सपा की बढ़ती ताकत को लेकर चर्चाएं तेज हुईं।

हालांकि, लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे अलग हो सकते हैं। इसलिए लोकसभा चुनाव के परिणामों के आधार पर विधानसभा चुनाव का नतीजा तय मानना सही नहीं होगा।

जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे होंगे निर्णायक

अगर योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के बीच सीधा मुकाबला होता है, तो जातीय समीकरण, स्थानीय विकास, रोजगार, कानून-व्यवस्था और राम मंदिर से जुड़े मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं। भाजपा अपने संगठन और विकास कार्यों पर भरोसा कर सकती है, जबकि सपा पिछड़े वर्गों, दलितों और अन्य मतदाताओं के समर्थन को मजबूत करने की कोशिश करेगी।

फिलहाल दोनों नेताओं के बीच सीधी चुनावी भिड़ंत आधिकारिक रूप से तय नहीं है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि कौन बाजी मारेगा। अंतिम तस्वीर उम्मीदवारों की घोषणा और मतदाताओं के रुख से ही स्पष्ट होगी।