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अखिलेश यादव के ‘नीले ड्रेस कोड’ पर सियासी घमासान, BSP के विश्वनाथ पाल ने कसा तंज

अखिलेश यादव ड्रेस
अखिलेश यादव के ‘नीले ड्रेस कोड’ पर सियासी घमासान, BSP के विश्वनाथ पाल ने कसा तंज
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अखिलेश यादव: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी के नए ‘नीले ड्रेस कोड’ को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। समाजवादी छात्रसभा के पदाधिकारियों के लिए नीली जींस और नीली टी-शर्ट का ड्रेस कोड तय किए जाने के बाद बहुजन समाज पार्टी ने अखिलेश यादव पर निशाना साधा है। बसपा प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने कहा कि केवल नीले कपड़े पहनने से बहुजन समाज और सामाजिक न्याय की राजनीति साबित नहीं होती।

विश्वनाथ पाल ने अखिलेश पर साधा निशाना

सुल्तानपुर में बसपा की जिला स्तरीय बैठक के दौरान विश्वनाथ पाल ने सपा के नए ड्रेस कोड पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव की सरकार के दौरान दलित और पिछड़े समाज से जुड़े कई मुद्दों पर अपेक्षित काम नहीं हुआ।

पाल ने बैकलॉग भर्तियों, एससी समाज के लिए ठेकेदारी में आरक्षण और पदोन्नति में आरक्षण जैसे मुद्दों का जिक्र करते हुए सपा के शासनकाल पर सवाल खड़े किए।

क्या है समाजवादी छात्रसभा का नया ड्रेस कोड?

समाजवादी पार्टी ने अपनी छात्र इकाई समाजवादी छात्रसभा के लिए नया ड्रेस कोड लागू किया है। इसके तहत कार्यकर्ता नीली जींस के साथ नीली टी-शर्ट या नीली शर्ट और पैंट में नजर आएंगे।

ड्रेस के साथ सपा की पहचान वाली लाल टोपी भी बनी रहेगी। पार्टी की ओर से इस बदलाव को नई पीढ़ी और बदलती सोच से जोड़कर पेश किया गया है।

अखिलेश यादव ने नीले रंग को बताया खास

अखिलेश यादव ने नीले रंग को संविधान, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों से जोड़ते हुए इसकी व्याख्या की है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी की सोच बदल रही है, इसलिए छात्र संगठन की वर्दी में भी बदलाव किया गया है। इस फैसले को युवाओं के साथ-साथ दलित युवाओं तक पहुंच बढ़ाने की सपा की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

यूपी की राजनीति में नीले रंग का महत्व

उत्तर प्रदेश की राजनीति में नीला रंग लंबे समय से दलित और आंबेडकरवादी राजनीति का प्रतीक रहा है। बसपा की राजनीतिक पहचान भी नीले रंग से जुड़ी हुई है। ऐसे में सपा की छात्र इकाई को नीले रंग की वर्दी देने के फैसले ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह कदम अखिलेश यादव की पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए रणनीति से भी जोड़ा जा रहा है।

2027 चुनाव से पहले बढ़ी राजनीतिक हलचल

उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव को लेकर सभी प्रमुख दल सामाजिक समीकरण मजबूत करने में जुटे हैं। सपा जहां पीडीए के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों के बीच अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश कर रही है, वहीं बसपा अपनी पारंपरिक दलित राजनीति को मजबूत करने में लगी है। ऐसे में सपा के नीले ड्रेस कोड को लेकर बसपा की प्रतिक्रिया चुनावी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

केवल रंग नहीं, संदेश की राजनीति

सपा के लिए नीला रंग नई पीढ़ी, संविधान और सामाजिक न्याय का संदेश देने का माध्यम है, जबकि बसपा इसे केवल बाहरी बदलाव के रूप में देख रही है। अब राजनीतिक नजरें इस बात पर हैं कि अखिलेश यादव का यह ‘नीला दांव’ युवाओं और दलित मतदाताओं के बीच कितना असर डालता है और 2027 के चुनावी समीकरणों पर इसका कितना प्रभाव पड़ता है।

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