ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने गौमाता और धर्म से जुड़े मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखते हुए कहा कि उनका किसी भी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि उनका संघर्ष केवल धर्म, गौमाता और मतदाताओं के अधिकारों के लिए है।
उनके अनुसार, किसी भी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध करना उनका उद्देश्य नहीं है, बल्कि धार्मिक और सामाजिक विषयों पर आवाज उठाना ही उनकी प्राथमिकता है। इस बयान के बाद प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
अविमुक्तेश्वरानंद ने सपा, भाजपा और कांग्रेस पर कही यह बात
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि भाजपा, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी सभी राजनीतिक दल हैं और उनका इन दलों से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अतीत में जब समाजवादी पार्टी की सरकार थी, तब उनके आंदोलन के दौरान उन पर लाठीचार्ज हुआ था।
उस समय भाजपा के कुछ कार्यकर्ता उनके समर्थन में खड़े थे, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे किसी दल के समर्थक हैं। उन्होंने कहा कि वे हमेशा मुद्दों के आधार पर अपनी बात रखते हैं और किसी पार्टी विशेष की राजनीति का हिस्सा नहीं हैं।
मतदाताओं के अधिकार और गौ संरक्षण पर जोर
शंकराचार्य ने अपने संबोधन में गौ संरक्षण और मतदाताओं के अधिकारों को प्रमुख विषय बताया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति जनता के पास होती है और सरकारों को जनता की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।
उन्होंने मांस निर्यात और गौ संरक्षण से जुड़े विषयों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसे महत्वपूर्ण निर्णयों में जनता की भावना और सहमति का सम्मान होना चाहिए। उनका कहना था कि वे केवल धार्मिक मूल्यों और जनहित से जुड़े विषयों को उठा रहे हैं, न कि किसी राजनीतिक लाभ के लिए बयान दे रहे हैं।
अविमुक्तेश्वरानंद के बयान के बाद बढ़ी राजनीतिक चर्चा
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है। विभिन्न दलों के नेताओं की ओर से इस पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। हालांकि शंकराचार्य ने दोहराया कि उनका उद्देश्य किसी दल का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि धर्म और गौमाता से जुड़े मुद्दों पर समाज को जागरूक करना है। उन्होंने कहा कि वे आगे भी अपने धार्मिक दायित्वों का पालन करते हुए इन विषयों पर आवाज उठाते रहेंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे बयान आगामी समय में भी सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने रह सकते हैं, जबकि धार्मिक संगठनों के बीच भी इस विषय पर चर्चा जारी रहने की संभावना है।
