उत्तर प्रदेश कैडर के 2022 बैच के आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह राही ने अचानक अपने पद से इस्तीफा देकर प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है। उन्होंने अपने इस्तीफे में साफ कहा कि उन्हें लंबे समय से कोई ठोस पोस्टिंग या जिम्मेदारी नहीं दी जा रही थी। वेतन तो मिल रहा था, लेकिन जनसेवा का अवसर नहीं मिल रहा था, जिसे उन्होंने अपने निर्णय का मुख्य कारण बताया।
राही का कहना है कि एक अधिकारी के तौर पर बिना काम के बने रहना उनके लिए नैतिक रूप से सही नहीं है। उन्होंने इसे “नैतिक निर्णय” बताते हुए कहा कि जब सिस्टम में ईमानदारी से काम करने का अवसर नहीं मिले, तो पद पर बने रहना बेकार है।
SDM कार्यकाल के बाद साइडलाइन होने का आरोप
रिंकू सिंह राही ने अपने इस्तीफे में यह भी आरोप लगाया कि एसडीएम के रूप में कार्रवाई करने के बाद उन्हें साइडलाइन कर दिया गया। शाहजहांपुर में तैनाती के दौरान उन्होंने साफ-सफाई और अनुशासन को लेकर सख्त कदम उठाए थे, लेकिन विवाद के बाद उन्हें हटाकर लंबे समय तक निष्क्रिय रखा गया।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि राज्य में “समानांतर व्यवस्था” काम कर रही है, जिसके चलते ईमानदार अधिकारियों को प्रभावी ढंग से काम करने का मौका नहीं मिलता।
रिंकू सिंह राही के संघर्ष और साहस की कहानी
रिंकू सिंह राही का करियर संघर्षों से भरा रहा है। वर्ष 2009 में उन्होंने छात्रवृत्ति घोटाले का खुलासा किया था, जिसके बाद उन पर जानलेवा हमला हुआ और उन्हें कई गोलियां लगीं। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और बाद में UPSC पास कर IAS बने।
उनकी पहचान एक ईमानदार और सख्त अधिकारी की रही है, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ खुलकर आवाज उठाते रहे हैं।
रिंकू सिंह राही ने प्रशासनिक व्यवस्था पर उठाए सवाल
राही के इस्तीफे ने एक बार फिर प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या ईमानदार अधिकारियों को सिस्टम में काम करने का मौका नहीं मिल रहा? क्या सख्त कार्रवाई करने वालों को साइडलाइन किया जाता है?
सोशल मीडिया और प्रशासनिक हलकों में इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है। कुछ लोग इसे एक ईमानदार अधिकारी की पीड़ा मान रहे हैं, तो कुछ इसे व्यक्तिगत निर्णय बता रहे हैं।
सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार
फिलहाल इस मामले में सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन रिंकू सिंह राही का इस्तीफा यह जरूर संकेत देता है कि प्रशासनिक ढांचे में कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जिन पर गंभीर चर्चा की जरूरत है।
यह मामला आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है, खासकर तब जब प्रशासनिक सुधार और पारदर्शिता की बात लगातार उठती रही है।
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