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मेरठ के सलावा गांव में UGC बिल के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन

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मेरठ के सलावा गांव में UGC बिल के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन
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मेरठ के ठाकुर चौबीसी के सलावा गांव में सोमवार को UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) बिल 2026 के खिलाफ स्थानीय युवाओं और सामाजिक संगठनों ने जोरदार प्रदर्शन किया। आरोप है कि इस बिल के नए प्रावधान सामान्य वर्ग के खिलाफ पक्षपातपूर्ण और “काला कानून” है, जिससे समाज में विभाजन बढ़ेगा और शिक्षा व्यवस्था प्रभावित होगी। विरोध प्रदर्शन देर शाम तक जारी रहा, जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण और युवा शामिल हुए और उन्होंने रैली निकालकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यदि केंद्र सरकार इस बिल पर गंभीरता से विचार नहीं करेगी, तो वे बड़े आंदोलन को अंजाम देंगे।

इस दौरान वक्ताओं ने ग्रामीणों को जागरूक करते हुए सरकार से बिल को तुरंत वापस लेने की मांग की। प्रदर्शन में शामिल लोगों ने UGC बिल का पुतला दहन किया और सरकार को चेतावनी दी कि यह कानून सामाजिक सौहार्द और समानता के खिलाफ है। विरोध प्रदर्शन में मुख्य रूप से गांव के प्रधान बंटी सोम, पूर्व प्रधान सुनील कुमार, भारतीय किसान यूनियन क्रांतिकारी के जिला अध्यक्ष राजीव राणा, तथा करणी सेना भारत के तहसील अध्यक्ष निश्चय सोम सहित कई सामाजिक कार्यकर्ता और युवा थे।

साथ ही इस विरोध प्रदर्शन को देश के अन्य हिस्सों में जारी विरोध की कड़ी के रूप में भी देखा जा रहा है। प्रदेश के अलग-अलग शहरों और विश्वविद्यालयों में भी इस बिल के विरोध में युवा, छात्र और सामाजिक समूह आवाज उठा रहे हैं और सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं।

विरोध की वजह और सरकार की प्रतिक्रिया

सरकार का कहना है कि इस बिल का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव और भेदभावपूर्ण प्रथाओं को समाप्त करना तथा शिक्षा में समता और गुणवत्ता को बढ़ावा देना है। हालांकि विरोध करने वाले इसे सामान्य समाज के खिलाफ एक पक्षपातपूर्ण और विभाजनकारी कदम मान रहे हैं।

इस बिल पर विरोध का असर सिर्फ सलावा गांव तक सीमित नहीं रहा। इससे पहले बरेली में एक PCS अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री ने भी विरोध स्वरूप अपना इस्तीफा दिया था, जिसके बाद शासन ने उन्हें निलंबित कर जांच बैठा दी है। इसी तरह लखनऊ यूनिवर्सिटी के छात्रों ने भी विरोध प्रदर्शन और ज्ञापन देने जैसी गतिविधियाँ की हैं, जिसमें कहा गया है कि यदि पांच दिनों के भीतर सरकार कानून वापस नहीं लेती, तो वे विधानसभा का घेराव करेंगे।

प्रदर्शनकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह भी कहना है कि बिल से युवाओं, छात्रों और सामान्य वर्ग के लोगों के शैक्षणिक अवसरों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। आगरा में एक बीजेपी नेता ने तो विरोध के तौर पर अपने खून से प्रधानमंत्री को एक पत्र तक लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि यह कानून “सामान्य छात्रों की प्रतिभा को दबा सकता है” और इसमें संशोधन की आवश्यकता है।

वहीं, हापुड़ में भी राष्ट्रीय सैनिक संस्था के पदाधिकारियों ने सरकार के खिलाफ राष्ट्रपति को खून से खत लिखा, जिसमें वे बिल को “काला कानून” बताते हुए इसके संशोधन या रद्द करने की मांग कर रहे हैं।

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