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यूजीसी के नए नियम पर भड़के शंकराचार्य, कहा “सरकार अलग-अलग समूहों में…

UGC Shankaracharya Avimukteshwararnanad
यूजीसी के नए नियम पर भड़के शंकराचार्य, कहा "सरकार अलग-अलग समूहों में...
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UGC New Rule: ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी किए गए नए शिक्षा नियमों पर कड़ा विरोध जताया है। उन्होंने इन नियमों को एक “बांटने और काटने की मशीन” करार दिया है और तर्क दिया है कि यह सनातन संस्कृति और हिन्दू समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं। शंकराचार्य का कहना है कि इस तरह के नियम समाज में वर्गों और जातियों के बीच विभाजन पैदा करेंगे जिससे अंततः सनातन धर्म की एकता और स्थिरता को गंभीर क्षति पहुँच सकती है। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसा कानून कैसे लागू किया जा सकता है जो एक ही समुदाय के लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ उकसाता है।

वे यह भी कहते हैं कि जब एक समूह को दूसरे समूह के सामने लाकर खड़ा किया जाता है, तो परिणामस्वरूप न केवल सामाजिक तनाव बढ़ता है, बल्कि दोनों पक्षों को ही नुकसान होता है और यह हिन्दू धर्म को कमजोर करने का काम करता है। इसी कारण उन्होंने नए नियमों को “सनातन को काटने और बांटने वाली मशीन” बताया।

माघ मेले विवाद और शंकराचार्य की प्रतिक्रिया

यूजीसी नियमों के अलावा, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने माघ मेले में मौनी अमावस्या के दौरान हुई घटना को भी गंभीर बताया और इसे “कल्पनीय नहीं” कहा। बताया जा रहा है कि इस दौरान कुछ युवाओं संग अनुचित व्यवहार हुआ, जिसके लिए शंकराचार्य प्रशासन पर नाराज दिखे। उन्होंने कहा कि उन्होंने 11 दिनों तक मौके सुधारने का अवसर दिया, लेकिन कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया।

इस दौरान शंकराचार्य ने राज्य और केंद्र सरकार पर भी कटाक्ष किए और गौ हत्या पर अपनी असहमति जताई। उन्होंने कहा कि जो कुछ भी हुआ, वह प्रशासन की संवेदनशीलता की कमी का परिणाम है और इससे धार्मिक और सामाजिक मूल्यों पर प्रश्न उठते हैं।

UGC ने नए नियम पर भड़के शंकराचार्य

शंकराचार्य का मानना है कि यूजीसी के नए नियम समाज को अलग-अलग समूहों में बाँटने का काम करेंगे और इससे समाज में वैमनस्य फैल सकता है। वे कहते हैं कि कानून जाति आधारित भेदभाव को बढ़ावा देने जैसा लग रहा है और इससे समाज में “लड़ो और मरो” जैसा माहौल बन सकता है। इसके अलावा वे सरकार के रवैये पर भी सवाल उठा रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि इस तरह के नियमों में सुधार किया जाना चाहिए।

कुल मिलाकर शंकराचार्य का यह बयान न केवल शिक्षा नीति पर आलोचना है, बल्कि यह धार्मिक और सामाजिक एकता के बड़े मुद्दे पर गहरी चिंता का संकेत भी देता है। उनके इस विरोध से इस विवाद ने व्यापक सामाजिक और राजनीतिक बहस का रूप ले लिया है।

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