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प्रेरणा: ऑटो चलाकर पिता के कैंसर का इलाज करा रही है दिव्यांग बेटी

आज के समय में लड़कियां किसी भी मामले में लड़को से कम नहीं हैं. अब लोग बेटे और बेटी में अंतर करना खत्म कर दिए हैं. अब हर घर में बेटियों को भी उतना ही सम्मान मिलता है, जितना बेटों को. आज हम आपकों एक बेटी की ऐसी ही दास्तां सुनाने जा रहे हैं, जो किसी दूसरे के लिए प्रेरणा बन सकती है.

आज हम आपकों एक ऐसी बेटी के बारे में बताने जा रहे हैं, जो अपने पिता के कैंसर के इलाल के लिए खुद ऑटो चला कर उनके इलाज का खर्चा उठा रही है. इस बेटी के हौसले और जज्बे को देख कर हर कोई सलाम कर रहा है.

पिता के इलाज के लिए छोड़नी पड़ी कॉल सेंटर की नौकरी

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यह कहानी है गुजरात के सूरत की अंकिता शर्मा का. अंकिता ने इकोनाॅमिक्स में ग्रेजुएशन किया हुआ है और उसके बाद उन्होंने वहीं के एक कॉल सेंटर में काम करना शुरू किया था, जहां से ठीकठाक कमाई हो जाती थी और परिवार का खर्चा चल रहा था, लेकिन इसी बिच उनके पिता को कैंसर हो गया और पिता की देखभाल के लिए उन्हें काम छोड़कर महीने में कई बार घर आना पड़ता था. जिससे काम प्रभावित होने लगा फिर अंकिता ने अपनी नौकरी छोड़ दी और पिता के इलाज के लिए ऑटो ड्राइवर बन गई.

विकलांग होने के कारण नहीं मिली दूसरी नौकरी

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अंकिता शर्मा अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं. पढ़ाई लिखाई में होशियार अंकिता शरीर से विकलांग हैं. अंकिता ने बताया कि रोज के 12 घंटे की नौकरी के बाद उन्हें महीने के सिर्फ 12000 रूपये ही मिलते थे, इसलिए उन्होंने ये नौकरी छोड़ दूसरी नौकरी करने का फैसला किया, लेकिन कोई भी नई कंपनी उन्हें जॉब नहीं दे रही थी. कई कम्पनियां तो उन्हें सिर्फ इस वजह से रिजेक्ट कर रही थी, क्योंकि अंकिता विकलांग हैं और एक विकलांग को नौकरी देना ये कम्पनियां अपनी शान के खिलाफ समझती हैं.

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दोस्त की मदद से सिखा ऑटो अब महीने की कमाती हैं 20 हजार रूपये

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अंकिता शर्मा ने बताया कि जब उन्हें सब जगह से निराशा हाथ लगी तो ऐसे घड़ी में उनके दोस्त  ‘लालजी बारोट’ ने उनकी मदद की और उन्हें ऑटो चलाना सिखाया.  ‘लालजी बारोट’ खुद भी विकलांग हैं, उन्होंने अंकिता की मदद की और उसे पहले ऑटो चलाना सिखाया फिर कस्टमाइज ऑटो रिक्शा खरीदने में अंकिता की मदद की, जिसमे ब्रेक एक हाथ से लगाया जा सकता है.

अंकिता अब अपने दोस्त की मदद से ऑटो चलाकर महीने के 20 हजार तक कमा लेती हैं, ये पैसे अंकिता अपने पिता के इलाज में लगाती हैं. अंकिता के इस हौसले की कहानी जिसने भी सुनी वो बस उनका मुरीद हो चला.

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