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इल्मा अफ़रोज़ का संघर्ष: न्यूयॉर्क की नौकरी छोड़ देश सेवा के लिए किया UPSC क्लियर, कभी मोमबत्ती की रौशनी में करनी पड़ती थी पढ़ाई

अगर इंसान पूरे दिल से मेहनत करें तो वो कुछ भी कर सकता है । आज हम आपकों उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के कुंदरकी कस्बे के एक छोटे से किसान की बेटी इल्मा अफ़रोज़ की कहानी के बारे में बताने जा रहे है, जिन्होंने अपनी मेहनत से आईएस अधिकारी की कुर्सी पाई….

मां ने अकेले की परवरिश

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एक युवा बेटी और 12 साल के बेटे की देखभाल करने के लिए इल्मा की मां ने बच्चों की परवरिश करने का बीड़ा उठाया। इल्मा बताती हैं कि

“मेरी माँ ने मेरे छोटे भाई और मुझे बहुत संघर्ष करते हुए पाला है। वह बहुत मजबूत महिला हैं। जहाँ लड़की के दहेज के लिए बचत करना और जल्दी शादी कर देने का प्रचलन है वही उन्होंने मुझे अपनी क्षमता पूरी करने का मौका दिया।”

इल्मा की माँ खेती करती थी और उन्हीं पैसो से परिवार का पालन करती थी। इल्मा बताती है कि उनके आस पास रहने वाले बच्चे जहाँ आईआईटी और एमबीबीएस की कोचिंग लेने जाते थे वहीं इल्मा मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ाई करती थी। अपने गृहनगर में हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद इल्मा ने दिल्ली के प्रसिद्ध सेंट स्टीफन कॉलेज में दाखिला लिया और फिलॉसफी में ग्रेजुएशन किया।

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इल्मा कहती हैं कि

“सेंट स्टीफन में मैंने फिलॉसफी का अध्ययन करने में जो तीन साल बिताए वे मेरे जीवन के अब तक के सबसे अच्छे वर्ष थे। विषय को ऐसे वातावरण में सीखना जहां प्रोफेसर छात्रों के साथ निकटता से जुड़ सकते हैं, इससे मुझे महत्वपूर्ण पाठों में मदद मिली। हमने कक्षा के बाहर भी बहुत कुछ सीखा। फिलॉसफी एक व्यक्ति को अपने दम पर सोचने के लिए प्रोत्साहित करता है।”

स्कॉलरशिप पर पूरी की पढ़ाई

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इल्मा की कड़ी मेहनत और समर्पण ने उन्हें विश्व प्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भाग लेने के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की। हालांकि उन्हें पढ़ाई और रहने का खर्चा स्कॉलर्शिप में ही मिलने वाला था परन्तु उनके पास हवाई यात्रा के पैसे नहीं थे। वह मदद मांगने के लिए गाँव के चौधरी दादा के पास पहुँची और उन्हें अपने विलायत जाने के बारे में बताया।

वह देख रहीं थी की कैसे उनके दादा खेतों में पसीना बहा कर कड़ी धूप में फसल की कटाई कर रहे थे। कई साल बीतने के बावजूद इल्मा कभी अपने दादा की उस अवस्था को नहीं भूल पाईं। यूनाइटेड किंगडम में अपने समय के बाद, उन्होंने न्यूयॉर्क शहर में अपना रास्ता बनाया जहां उन्होंने मैनहट्टन क्षेत्र में एक स्वैच्छिक सेवा कार्यक्रम में भाग लिया। हालाँकि, वह इस सब से संतुष्ट नहीं थीं।

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इल्मा कहती हैं कि

“हर दिन जब मैं मैनहट्टन शहर में अपने कमरे में लौटती थी तो मैं घर के लिए तरस जाती थी। अम्मी के लिए और उसकी मुस्कुराहट के लिए। मैं अपने कमरे की खिड़की से बाहर न्यूयॉर्क स्काईलाइन को देखती थी और माचिस की तीली जैसी पीली टैक्सियों को देखती थी, जो अमेरिकी सपने से जुड़ी एक सर्वव्यापी छवि है। लेकिन एक ही सवाल मेरे मैं में था की क्या मेरे पढ़ने लिखने का सपना केवल अमेरिका आने के लिए था? क्या मेरे यहाँ आने से मेरे गाँव के लोगों के जीवन में कोई सुधार आ रहा है?”

नौकरी छोड़ चुनी समाजसेवा की राह

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गांधीजी के ’हर आंख से हर आंसू पोंछना’ के सपने से प्रेरित होकर इल्मा ने यह महसूस किया कि राष्ट्र को उनकी शिक्षा का लाभ मिलना चाहिए और गांधी जी के सपने को पूरा करने के लिए वह अपना थोड़ा सा प्रयास करना चाहती थी। जब भी इल्मा छुट्टियों के लिए घर लौटती थीं वह देखती थी कि लोगों की आँखें खुशी आशा की चमक है यह सोचकर कि “हमारी बेटी हमारे दर्द को दूर कर देगी।”

रिश्तेदारों और परिचितों ने उसे राशन कार्ड प्राप्त कराने, फॉर्म भरने या मोतियाबिंद सर्जरी के लिए किसी को लेने जैसी सरल चीजों की तलाश की।

इल्मा कहती हैं कि

“मैं हमेशा जानती थी कि मेरी खुशी भारत में अम्मी और मेरे आसपास के सभी लोगों के साथ वापस घर में है,जब उन्हें इन सभी बातों का एहसास हुआ तो उन्होंने UPSC की सिविल सेवा परीक्षा पास कर लोगों की भलाई के लिए काम करने का निर्णय लिया और वह घर लौट आई।”

इल्मा ने 2017 में UPSC की सिविल सेवा परीक्षा 217वीं रैंक से पास की। उन्हें हिमाचल प्रदेश कैडर में आईपीएस नियुक्त किया गया। इल्मा इस बात का उदहारण है कि इच्छा शक्ति से कोई भी मुकाम हासिल करना मुश्किल नहीं है। जहाँ ज़्यादातर युवा सुख-सुविधा का जीवन चुनते हैं वही इल्मा अफ़रोज़ ने देश की सेवा के लिए एक अच्छी नौकरी को छोड़ दिया। वह देश के हर युवा के लिए एक प्रेरणा स्त्रोत हैं।