दिव्यांग राधेश्याम नहीं हैं किसी मसीहा से कम, हौंसला ऐसा कि बड़े से बड़ा दानवीर भी उनके सामने है बौना

divyang radhey shayam

दिव्यांग लोगों का जीवन हमेशा से ही दूसरो के ऊपर निर्भर हो जाता है, लेकिन आज हम आपकों एक ऐसे दिव्यांग की कहानी के बारें में बताने जा रहे हैं, जिसने अपनी इस कमी को कमी न मानकर अपने को कभी किसी से पीछे ना रखा। इतना ही नहीं दूसरों की मदद कर के मसीहा भी बन गए। ये शख्स हैं राधेश्याम गुप्ता, जोकि बिहार के एक छोटे से गांव पैगम्बरपुर के रहने वाले हैं। राधेश्याम ने दिव्यांगता को मात देते हुए गरीब व जरूरतमंद लोगों के प्रति अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया है। आइए जानते हैं राधेश्याम के बारें में …

1779 में हुआ जन्म

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1779 में जन्में समाजसेवी राधेश्याम जी जो स्वंय से ही दिव्यांग हैं यह कहते हुए कि –

“मैं तो किसी तरह अपना काम गिरते-पड़ते कर ही लेता हूं, मुझसे अधिक ज़रुरत इस साईकिल की अवधेश जी को है और अब इस साईकिल के सहारे अवधेश जी अपना जीवन सामान्य रुप से जी सकेंगें, सच कहूं तो यह भेंट देकर मैं खुद को सौभाग्यशाली महसूस कर रहा हूं”

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राधेश्याम जी कहते हैं –

“जब मेरा जन्म हुआ तो मेरे शरीर में कमर के पास एक चमड़े की थैली जैसा कुछ विकसित हो रहा था जो कि मेरी पांच वर्ष की आयु आते-आते एक पानी भरे गुब्बारे के साइज़ का होने लगा था। उस समय साइंस के ज़्यादा विकसित न होने के चलते यह केस डॉक्टरों की समझ से बाहर था, बहरहाल मुझे पटना रेफर कर दिया गया , सीनियर डॉक्टरों द्वारा सर्जरी के बाद उस थैली के प्रकार के अंग को अलग तो कर दिया गया किंतु डाक्टरों नें ये क्लियर कर दिया था कि भविष्य में इसका दुष्प्रभाव शरीर के किसी अन्य अंग या दिमाग पर पड़ सकता है, शायद उसी ऑपरेशन के परिणामस्वरुप यह दिव्यांगता मुझे मिली हो।”

राधेश्याम गुप्ता ने उन्हें सरकार से मिली ट्राईसाईकिल अवधेश मिश्रा नाम के एक अन्य दिव्यांग को भेंट कर दी। राधेश्याम गुप्ता का मानना था कि इस ट्राईसाईकिल की उनसे ज्यादा जरूरत मिश्रा जी को थी।

शुरु की समाजसेवा

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राधेश्याम गुप्ता काम के साथ-साथ पढ़ाई भी करते रहे और आठवीं तक पहुंचने के बाद बाजार में सामान बेचना छोड़ दिया। वह दलित बस्ती में जाकर बच्चों को ट्यूशन देने लगे। इसके लिए उन्होंने कोई फीस नहीं रखी थी। इसके बाद वो पटना आ गए। यहां वह रेलवे स्टेशन में काम करने लगे। इसी समय लोगों को ठंड व गर्मी में सडक़ों में बेहाल सोता या रहते हुए देखकर परेशान हो जाते थे।

श्री गुप्ता खुद को उनसे बेहतर पाते थे और इसके चलते ही जिदंगी भर उन्होंने लोगों की सेवा करने की ठान ली। इसलिए उन्होंने लोगों की सेवा व सहायता करने के लिए सोशल मीडिया को सहारा बनाया। वह जरूरतमंद लोगों की सेवा करने की अपील सोशल मीडिया के जरिए करते हैं और उसका एकाऊंट खुलवाकर वही नंबर सार्वजनिक कर देते हैं। इस तरह से दानदाता लोग जरूरतमंदों की सहायता कर देते हैं।

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राधेश्याम ने बताया कि इस काम को जिन्होंने भी सुना उन्होंने अपनी ओर से भी मदद करने का आश्वासन दिया। इस तरह से सेवाभाव करने वाले लोगों की एक चेन बन गई। उनके अनुसार फिलहाल दुबई, सिंगापुर और अफ्रीका सहित कई देशों के लोग उनसे जुड़े हुए हैं। राधेश्याम के इस जज्बें को हमारा सलाम है.